📿 श्लोक संग्रह

बलं बलवतां चाहम्

गीता 7.11 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥
बलम्
शक्ति, बल
बलवताम्
शक्तिमानों का
और
अहम्
मैं
कामराग विवर्जितम्
काम और राग से रहित
धर्मअविरुद्धः
धर्म के विरुद्ध न हो, धर्मसम्मत
भूतेषु
प्राणियों में
कामः
इच्छा, कामना
अस्मि
हूँ
भरतर्षभ
हे भरतश्रेष्ठ (अर्जुन)

कृष्ण कहते हैं — शक्तिमान व्यक्ति में जो बल है, वह मैं हूँ — लेकिन वह बल जो काम और राग से मुक्त हो। यानी जो बल केवल अहंकार या लालच के लिए नहीं, बल्कि निष्पक्ष भाव से है — वह परमात्मा का अंश है।

दूसरी बात — प्राणियों में जो धर्म के अनुकूल कामना है, वह भी मैं हूँ। जैसे एक किसान अच्छी फसल चाहता है — यह कामना धर्म के विरुद्ध नहीं है। वह भी उसी परमात्मा की शक्ति से है।

यह श्लोक यह नहीं कहता कि सारी इच्छाएँ परमात्मा हैं — केवल वे जो धर्म के अनुकूल हैं। यह एक सूक्ष्म भेद है जिसे ध्यान से समझना चाहिए।

विभूति-परिचय का यह अंतिम श्लोक एक महत्वपूर्ण सूक्ष्मता लाता है — 'धर्माविरुद्धः कामः'। जो इच्छा धर्म-विरुद्ध नहीं है वह परमात्मा की शक्ति है। इससे स्पष्ट होता है कि संसार की सभी क्रियाओं को परमात्मा नहीं कहा जा सकता।

महाभारत के शान्ति पर्व में भी धर्मानुकूल कामना को उचित माना गया है। गीता यहाँ उसी नैतिक ढाँचे में 'कामना' को परिभाषित करती है।

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