कृष्ण कहते हैं — शक्तिमान व्यक्ति में जो बल है, वह मैं हूँ — लेकिन वह बल जो काम और राग से मुक्त हो। यानी जो बल केवल अहंकार या लालच के लिए नहीं, बल्कि निष्पक्ष भाव से है — वह परमात्मा का अंश है।
दूसरी बात — प्राणियों में जो धर्म के अनुकूल कामना है, वह भी मैं हूँ। जैसे एक किसान अच्छी फसल चाहता है — यह कामना धर्म के विरुद्ध नहीं है। वह भी उसी परमात्मा की शक्ति से है।
यह श्लोक यह नहीं कहता कि सारी इच्छाएँ परमात्मा हैं — केवल वे जो धर्म के अनुकूल हैं। यह एक सूक्ष्म भेद है जिसे ध्यान से समझना चाहिए।