📿 श्लोक संग्रह

जितात्मनः प्रशान्तस्य

गीता 6.7 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥
जितात्मनः
मन-जीते हुए का
प्रशान्तस्य
शांत चित्त वाले का
परमात्मा समाहितः
परमात्मा स्थिर है
शीतोष्ण
सर्दी-गर्मी में
सुखदुःखेषु
सुख-दुख में
मानापमानयोः
मान और अपमान में

जिसने अपने मन को जीत लिया है, जो भीतर से शांत है — उसके हृदय में परमात्मा स्थिर होकर बस जाते हैं। उसे न सर्दी परेशान करती है न गर्मी, न सुख उछालता है न दुख तोड़ता है, न किसी की तारीफ फुलाती है न निंदा डुबाती है।

यह स्थिति एक पुराने और अनुभवी बुजुर्ग जैसी होती है — जो हर मौसम देख चुका हो, हर परिस्थिति झेल चुका हो। अब वह न अच्छे से बहुत खुश होता है, न बुरे से बहुत दुखी। यही परमात्मा की स्थिरता का संकेत है।

यह श्लोक 'जितात्मा' के परिणाम को बताता है। 6.6 में कहा था कि मन को जीतो — 6.7 में बताया जाता है कि जीतने पर क्या मिलता है। परमात्मा की स्थिरता ही जितात्मा का पुरस्कार है।

गीता में 'समत्व' — समभाव — एक मुख्य विषय है। दूसरे अध्याय (2.14–2.15) में भी यही कहा गया था कि जो शीत-ताप सहन करता है, वही अमृत का अधिकारी है।

अध्याय 6 · 7 / 47
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