यह 6.37–45 खंड का समापन श्लोक है। कृष्ण कहते हैं — जो योगी जन्म-जन्मांतर प्रयत्नपूर्वक साधना करता है, उसके सब पाप धुल जाते हैं, और अनेक जन्मों में सिद्धि पाकर वह अंत में परम गति को पाता है।
यह धैर्य का संदेश है। एक जन्म में न हो तो अगले में होगा। और अगले में न हो तो उसके अगले में। साधना कभी व्यर्थ नहीं — वह संस्कार बनकर आगे बढ़ती रहती है। अंत में परम गति तय है।