📿 श्लोक संग्रह

तपस्विभ्योऽधिको योगी

गीता 6.46 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥
तपस्विभ्यः अधिकः
तपस्वियों से बढ़कर
योगी
योगी
ज्ञानिभ्यः अपि मतः अधिकः
ज्ञानियों से भी बढ़कर माना जाता है
कर्मिभ्यः च अधिकः
कर्मकांडियों से भी बढ़कर
तस्मात् योगी भव अर्जुन
इसलिए योगी बनो, हे अर्जुन

अध्याय के उपसंहार में कृष्ण कहते हैं — योगी तीनों से बढ़कर है। तपस्वी से — जो केवल शरीर कष्ट देते हैं। ज्ञानी से — जो केवल शास्त्र जानते हैं। कर्मकांडी से — जो केवल अनुष्ठान करते हैं। इसलिए — अर्जुन, योगी बनो।

यह 'बढ़कर' तुलनात्मक नहीं — पूरक है। तपस, ज्ञान, कर्म — सब योग के अंग हैं। जो इन सबको समेटकर जीता है — वही योगी है। इसीलिए वह सबसे पूर्ण है।

यह श्लोक छठे अध्याय का आह्वान है — कृष्ण अर्जुन को योगी बनने का सीधा निमंत्रण देते हैं। 6.1 से शुरू हुई यात्रा यहाँ अपने व्यावहारिक निष्कर्ष पर आती है।

गीता में यह तुलनात्मक श्रेणी — तपस्वी, ज्ञानी, कर्मी, योगी — अध्याय के उद्देश्य को स्पष्ट करती है। योग एक समन्वित साधना है, अलग-अलग मार्गों का संगम।

अध्याय 6 · 46 / 47
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