📿 श्लोक संग्रह

पूर्वाभ्यासेन तेनैव

गीता 6.44 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥
पूर्वाभ्यासेन तेन एव
उसी पूर्व-अभ्यास से
ह्रियते
खिंचा जाता है
हि अवशः अपि सः
वह परवश होकर भी
जिज्ञासुः अपि योगस्य
योग को जानने की इच्छा भी
शब्दब्रह्म अतिवर्तते
शब्द-ब्रह्म — वेद-विधि — से ऊपर ले जाती है

पिछले जन्म का अभ्यास इतना गहरा होता है कि नए जन्म में भी वह व्यक्ति स्वाभाविक रूप से योग की ओर खिंचता है — चाहे वह समझे या न समझे, परवश होकर भी। यह 'खिंचाव' संस्कारों की ताकत है।

और एक और बड़ी बात कृष्ण कहते हैं — केवल 'योग को जानना चाहता हूँ' यह जिज्ञासा भी शब्द-ब्रह्म — यानी वेदों के अनुष्ठान और विधि-कर्म — से ऊपर है। जिज्ञासा ही साधना की शुरुआत है।

यहाँ 'शब्दब्रह्म' का अर्थ है वेदों की विधिवत् साधना — यज्ञ, अनुष्ठान आदि। कृष्ण कह रहे हैं कि योग की सच्ची जिज्ञासा उन बाहरी अनुष्ठानों से भी बड़ी है।

यह श्लोक योग की आंतरिक साधना को बाहरी धार्मिक अनुष्ठानों से ऊँचा रखता है — गीता का यह एक विशेष दृष्टिकोण है जो पूरे ग्रंथ में बार-बार आता है।

अध्याय 6 · 44 / 47
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