📿 श्लोक संग्रह

तत्र तं बुद्धिसंयोगम्

गीता 6.43 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥
तत्र
वहाँ — उस जन्म में
तम् बुद्धिसंयोगम्
उस बुद्धि के संयोग को
लभते पौर्वदेहिकम्
पूर्व शरीर का — पिछले जन्म का — पाता है
यतते च ततः भूयः
और उससे और अधिक प्रयास करता है
संसिद्धौ
सिद्धि के लिए
कुरुनन्दन
हे कुरुवंश के आनंद (अर्जुन)

यह बड़ी आशावाणी है। नए जन्म में वह योगी पिछले जन्म की बुद्धि और साधना के संस्कार साथ लेकर आता है। वह जन्म से ही उस बिंदु पर होता है जहाँ पिछली बार छोड़ा था। और फिर और अधिक जोर से प्रयास करता है।

जैसे एक बच्चा अपनी माँ की गोद में लौट आता है — नए जन्म में पूर्व-संस्कार ऐसे ही लौट आते हैं। साधना कभी नष्ट नहीं होती — वह अगले जन्म में जारी रहती है।

यह श्लोक 'संस्कारों की निरंतरता' का मूल सिद्धांत है। भारतीय दर्शन में कर्म और संस्कार जन्म-जन्मांतर तक साथ चलते हैं। गीता यहाँ यही बात आत्मसाधना के संदर्भ में कहती है।

मनोविज्ञान में भी 'अचेतन स्मृति' की अवधारणा है। गीता का 'पौर्वदेहिक बुद्धिसंयोग' उससे गहरा है — यह चेतना के स्तर पर निरंतरता की बात करता है।

अध्याय 6 · 43 / 47
अध्याय 6 · 43 / 47 अगला →