📿 श्लोक संग्रह

प्रयत्नाद्यतमानस्तु

गीता 6.45 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥
प्रयत्नात् यतमानः तु
पर प्रयत्नपूर्वक साधना करता हुआ
योगी संशुद्धकिल्बिषः
पापों से शुद्ध हुआ योगी
अनेकजन्मसंसिद्धः
अनेक जन्मों में सिद्ध हुआ
ततः याति
तब जाता है
पराम् गतिम्
परम गति को — सर्वोच्च अवस्था को

यह 6.37–45 खंड का समापन श्लोक है। कृष्ण कहते हैं — जो योगी जन्म-जन्मांतर प्रयत्नपूर्वक साधना करता है, उसके सब पाप धुल जाते हैं, और अनेक जन्मों में सिद्धि पाकर वह अंत में परम गति को पाता है।

यह धैर्य का संदेश है। एक जन्म में न हो तो अगले में होगा। और अगले में न हो तो उसके अगले में। साधना कभी व्यर्थ नहीं — वह संस्कार बनकर आगे बढ़ती रहती है। अंत में परम गति तय है।

यह श्लोक अर्जुन के प्रश्न (6.37–39) का अंतिम उत्तर है। 6.40 में आश्वासन दिया, 6.41–44 में रास्ता बताया, 6.45 में परिणाम बताया — परम गति। यह कृष्ण की करुणा का सबसे लंबा और विस्तृत उत्तर है।

'अनेकजन्मसंसिद्ध' — अनेक जन्मों में सिद्ध। यह शब्द बताता है कि आध्यात्मिक सिद्धि एक लंबी यात्रा है। पर यात्रा सुनिश्चित है — मंजिल तय है।

अध्याय 6 · 45 / 47
अध्याय 6 · 45 / 47 अगला →