पिछले जन्म का अभ्यास इतना गहरा होता है कि नए जन्म में भी वह व्यक्ति स्वाभाविक रूप से योग की ओर खिंचता है — चाहे वह समझे या न समझे, परवश होकर भी। यह 'खिंचाव' संस्कारों की ताकत है।
और एक और बड़ी बात कृष्ण कहते हैं — केवल 'योग को जानना चाहता हूँ' यह जिज्ञासा भी शब्द-ब्रह्म — यानी वेदों के अनुष्ठान और विधि-कर्म — से ऊपर है। जिज्ञासा ही साधना की शुरुआत है।