📿 श्लोक संग्रह

अथवा योगिनामेव

गीता 6.42 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥
अथवा
या फिर
योगिनाम् एव कुले
योगियों के ही कुल में
भवति
होता है, जन्म लेता है
धीमताम्
बुद्धिमान — ज्ञानी
एतत् हि दुर्लभतरम्
यह और भी दुर्लभ है
लोके जन्म यत् ईदृशम्
इस संसार में ऐसा जन्म

6.41 में एक विकल्प था — शुद्ध और समृद्ध कुल में जन्म। यहाँ दूसरा — और ऊँचा — विकल्प है। ज्ञानवान योगियों के कुल में जन्म। कृष्ण कहते हैं — यह तो और भी दुर्लभ है। ऐसे घर में जन्म लेना जहाँ साधना का वातावरण हो — यह बहुत बड़ी बात है।

सोचो — जहाँ जन्म से ही ध्यान, सत्संग, शास्त्र-पाठ का माहौल हो — वहाँ बच्चा स्वाभाविक रूप से साधना में लगेगा। यह पिछले जन्म के योग-संस्कारों का फल है। एक तरह से साधना वहाँ से शुरू होती है जहाँ पिछले जन्म में छूटी थी।

6.41–42 दो प्रकार के शुभ जन्मों की बात करते हैं। दोनों में एक बात समान है — अधूरे योगी को अच्छा जन्म मिलता है, बुरा नहीं। यह गीता का करुणापूर्ण दर्शन है।

भारतीय परंपरा में 'सत्संग' को सबसे बड़ा लाभ माना गया है। ज्ञानी योगियों के कुल में जन्म — यह सत्संग का सर्वोच्च रूप है — जन्म से ही मिलता है।

अध्याय 6 · 42 / 47
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