📿 श्लोक संग्रह

अयतिः श्रद्धयोपेतः

गीता 6.37 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥
अयतिः
प्रयास न करने वाला
श्रद्धया उपेतः
श्रद्धा सहित
योगात् चलितमानसः
योग से भटके मन वाला
अप्राप्य योगसंसिद्धिम्
योग की सिद्धि न पाकर
काम् गतिम् गच्छति
किस गति को जाता है
कृष्ण
हे कृष्ण

अर्जुन का यह प्रश्न बड़ा मार्मिक है। मान लो किसी में श्रद्धा है — वह योग करना चाहता है — पर आलस या परिस्थितियों के कारण पूरा प्रयास नहीं हुआ। मन योग से भटक गया। योग की सिद्धि नहीं मिली। तो ऐसे व्यक्ति का क्या होता है?

यह प्रश्न बहुत मानवीय है। हम में से कितने ऐसे हैं — योग, ध्यान, साधना शुरू करते हैं पर पूरी नहीं हो पाती। अर्जुन उन सबकी ओर से यह प्रश्न कर रहा है।

6.37–39 मिलकर अर्जुन का एक और प्रश्न-खंड बनाते हैं — अधूरे योगी का भविष्य। यह 6.33–34 की तरह व्यावहारिक चिंता है। कृष्ण 6.40 में उत्तर देंगे।

यह प्रश्न गीता के सबसे मानवीय प्रश्नों में से है — अधूरा प्रयास व्यर्थ होता है या नहीं? इसका उत्तर 6.40–45 में बड़ी आश्वस्ति देने वाला है।

अध्याय 6 · 37 / 47
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