📿 श्लोक संग्रह

असंयतात्मना योगः

गीता 6.36 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥
असंयतात्मना
असंयत — मन न जीते हुए — के लिए
योगः दुष्प्रापः
योग कठिन है, पाना मुश्किल
इति मे मतिः
यह मेरा मत है
वश्यात्मना तु
पर मन को वश में किए हुए के लिए
यतता
प्रयास करते हुए
शक्यः अवाप्तुम् उपायतः
उपाय से पाना संभव है

कृष्ण यहाँ स्पष्ट कहते हैं — जिसने मन पर काबू नहीं किया, उसके लिए योग कठिन है। यह उनका निजी मत है। पर फिर वे आशा देते हैं — जो उपाय से — यानी सही विधि से — प्रयास करे और मन को साधने की कोशिश करे, उसके लिए योग सम्भव है।

यहाँ 'उपायतः' — उपाय से — बड़ा महत्वपूर्ण है। केवल कठोर प्रयास से नहीं, सही रास्ते से। सही गुरु, सही विधि, सही समय — यह सब उपाय हैं। जो इन उपायों से चले, उसके लिए दरवाजा बंद नहीं।

6.35 में अभ्यास और वैराग्य बताए, 6.36 में कहा — उन उपायों से संयत पुरुष योग पा सकता है। यह दोनों श्लोक मिलकर अर्जुन के प्रश्न का पूरा उत्तर देते हैं।

'इति मे मतिः' — यह मेरा मत है — यह वाक्यांश गीता में कभी-कभी आता है जब कृष्ण निजी राय देते हैं। यहाँ वे विनम्रता से अपना दृष्टिकोण रखते हैं।

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