📿 श्लोक संग्रह

सर्वभूतस्थितं यो माम्

गीता 6.31 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥
सर्वभूतस्थितम् यः माम्
सब प्राणियों में स्थित मुझे जो
भजति एकत्वम् आस्थितः
एकत्व में स्थित होकर भजता है
सर्वथा वर्तमानः अपि
चाहे जैसे बर्तता हो
स योगी
वह योगी
मयि वर्तते
मुझमें ही रहता है

यह श्लोक बड़ी उदारता का है। जो एकत्व की भावना में स्थित होकर — यानी यह मानकर कि सब जगह एक ही परमात्मा है — सब प्राणियों में मेरी भक्ति करता है, वह योगी चाहे जैसे भी काम करे — मुझमें ही रहता है।

'सर्वथा वर्तमानोऽपि' — चाहे जैसे बर्ते। यानी खाना बनाते हुए, बच्चों की देखभाल करते हुए, खेत में काम करते हुए — जो एकत्व का भाव रखे, वह हर क्षण मुझमें है। योग केवल आसन पर नहीं होता।

यह 6.29–31 खंड का समापन है। सर्वत्र आत्मा-दर्शन (6.29), सर्वत्र मुझे देखना (6.30), और अब — एकत्व में स्थित होकर सब में भजन (6.31)। यह क्रम ज्ञान से भक्ति की ओर जाता है।

नारद भक्तिसूत्र में 'सर्वात्मभाव' — सब में आत्म-भाव — को परम भक्ति कहा गया है। गीता का यह श्लोक उसी भाव को व्यक्त करता है।

अध्याय 6 · 31 / 47
अध्याय 6 · 31 / 47 अगला →