यह श्लोक बड़ी उदारता का है। जो एकत्व की भावना में स्थित होकर — यानी यह मानकर कि सब जगह एक ही परमात्मा है — सब प्राणियों में मेरी भक्ति करता है, वह योगी चाहे जैसे भी काम करे — मुझमें ही रहता है।
'सर्वथा वर्तमानोऽपि' — चाहे जैसे बर्ते। यानी खाना बनाते हुए, बच्चों की देखभाल करते हुए, खेत में काम करते हुए — जो एकत्व का भाव रखे, वह हर क्षण मुझमें है। योग केवल आसन पर नहीं होता।