📿 श्लोक संग्रह

आरुरुक्षोर्मुनेः

गीता 6.3 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥
आरुरुक्षोः
चढ़ने की इच्छा रखने वाले का
मुनेः
मुनि का, साधक का
योगम्
योग में
कर्म
कर्म, कार्य
कारणम् उच्यते
साधन कहा जाता है
योगारूढस्य
योग में स्थित हो जाने पर
शमः
शांति, मन की स्थिरता

कृष्ण यहाँ योग की दो अवस्थाएँ बताते हैं। जब कोई साधक योग की ओर चलना शुरू करे — तब उसके लिए कर्म ही साधन है। यानी काम करते रहो, निष्काम भाव से। यह पहली सीढ़ी है।

जब वही साधक योग में पूरी तरह स्थिर हो जाए — तब शम अर्थात् मन की शांति उसका साधन बन जाती है। यह जैसे पहाड़ पर चढ़ने के लिए पैर चाहिए, पर चोटी पर पहुँच जाओ तो बस ठहरना होता है।

यह श्लोक गीता के व्यावहारिक मार्गदर्शन का एक उत्तम उदाहरण है। शुरुआत में कर्म चाहिए, परिपक्वता पर शांति। दोनों अवस्थाओं के लिए अलग साधन हैं।

परंपरा में 'आरुरुक्षु' और 'आरूढ' — ये दो अवस्थाएँ योग-शास्त्रों में भी मान्य हैं। शुरुआती साधक और सिद्ध साधक — दोनों के लिए मार्ग अलग होता है।

अध्याय 6 · 3 / 47
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