कृष्ण यहाँ एक बहुत सुंदर बात कहते हैं — 'सुखेन' — सहज ही। जो योगी निरंतर अभ्यास से पापरहित हो जाता है, वह ब्रह्म के स्पर्श का अनंत सुख 'आसानी से' भोगता है। यह कठिन संघर्ष का फल नहीं — यह सहज प्रवाह है।
'ब्रह्मसंस्पर्श' — ब्रह्म का स्पर्श — यह शब्द बड़ा कोमल है। जैसे किसी प्रिय का हाथ स्पर्श करे। परमात्मा का अनुभव कोई भारी घटना नहीं — एक कोमल स्पर्श है जो भीतर तक शांति भर देता है।