📿 श्लोक संग्रह

सर्वभूतस्थमात्मानम्

गीता 6.29 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥
सर्वभूतस्थम् आत्मानम्
सब प्राणियों में स्थित आत्मा को
सर्वभूतानि च आत्मनि
और सब प्राणियों को आत्मा में
ईक्षते
देखता है
योगयुक्तात्मा
योग से जुड़ी आत्मा वाला
सर्वत्र समदर्शनः
सर्वत्र समान दृष्टि वाला

यह अध्याय का एक बहुत महत्वपूर्ण श्लोक है। जो योगी योग में पूर्ण हो जाता है — वह क्या देखता है? वह सब प्राणियों में एक ही आत्मा देखता है, और उसी आत्मा में सब प्राणियों को। यह अलग-अलग जीव नहीं — एक ही शक्ति अनेक रूपों में।

जैसे समुद्र की अनेक लहरें हों — हर लहर अलग दिखती है, पर सब में पानी एक ही है। योगी उस 'पानी' को देखता है, 'लहर' को नहीं। जब यह दृष्टि आती है — तब 'मैं' और 'दूसरा' का भेद मिट जाता है।

यह श्लोक ईशोपनिषद् के प्रथम मंत्र — 'ईशावास्यमिदं सर्वम्' — से मेल खाता है। सब में ईश्वर है — यही दृष्टि यहाँ 'समदर्शन' के रूप में आती है।

6.29 से 6.32 तक एक खंड है जिसमें 'सर्वत्र समदर्शन' — हर जगह एकता देखना — की बात है। यह ज्ञान का उच्चतम फल है।

अध्याय 6 · 29 / 47
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