यह अध्याय का एक बहुत महत्वपूर्ण श्लोक है। जो योगी योग में पूर्ण हो जाता है — वह क्या देखता है? वह सब प्राणियों में एक ही आत्मा देखता है, और उसी आत्मा में सब प्राणियों को। यह अलग-अलग जीव नहीं — एक ही शक्ति अनेक रूपों में।
जैसे समुद्र की अनेक लहरें हों — हर लहर अलग दिखती है, पर सब में पानी एक ही है। योगी उस 'पानी' को देखता है, 'लहर' को नहीं। जब यह दृष्टि आती है — तब 'मैं' और 'दूसरा' का भेद मिट जाता है।