📿 श्लोक संग्रह

युञ्जन्नेवं सदात्मानम्

गीता 6.28 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥
युञ्जन् एवम् सदा
इस प्रकार सदा लगाते हुए
आत्मानम्
अपने मन को
योगी विगतकल्मषः
पापरहित योगी
सुखेन
आसानी से, सहज ही
ब्रह्मसंस्पर्शम्
ब्रह्म के स्पर्श को
अत्यन्तम् सुखम् अश्नुते
अनंत सुख को भोगता है

कृष्ण यहाँ एक बहुत सुंदर बात कहते हैं — 'सुखेन' — सहज ही। जो योगी निरंतर अभ्यास से पापरहित हो जाता है, वह ब्रह्म के स्पर्श का अनंत सुख 'आसानी से' भोगता है। यह कठिन संघर्ष का फल नहीं — यह सहज प्रवाह है।

'ब्रह्मसंस्पर्श' — ब्रह्म का स्पर्श — यह शब्द बड़ा कोमल है। जैसे किसी प्रिय का हाथ स्पर्श करे। परमात्मा का अनुभव कोई भारी घटना नहीं — एक कोमल स्पर्श है जो भीतर तक शांति भर देता है।

6.15 में भी 'निर्वाण की परम शांति' का उल्लेख था। यहाँ 6.28 में उसी को 'ब्रह्मसंस्पर्श का अनंत सुख' कहा गया है — दोनों एक ही अनुभव के दो नाम हैं।

यहाँ से गीता एक नए विषय की ओर जाती है — सर्वत्र आत्मा का दर्शन (6.29–32)। 6.28 उस खंड की भूमिका है।

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