📿 श्लोक संग्रह

प्रशान्तमनसं

गीता 6.27 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥
प्रशान्तमनसम्
शांत मनवाले
हि एनम् योगिनम्
इस योगी को
सुखम् उत्तमम् उपैति
उत्तम सुख मिलता है
शान्तरजसम्
शांत रजोगुण वाले
ब्रह्मभूतम्
ब्रह्म में मिले हुए
अकल्मषम्
पापरहित, निर्मल

जो योगी मन को शांत कर लेता है, जिसका रजोगुण — यानी बेचैनी और क्रियाशीलता — शांत हो जाता है, जो पापरहित होकर ब्रह्म का रूप हो जाता है — उसे उत्तम सुख मिलता है।

यहाँ 'ब्रह्मभूत' एक महत्वपूर्ण शब्द है। इसका अर्थ है — ब्रह्म बन जाना, ब्रह्म हो जाना। यह अलगाव का नहीं, एकता का अनुभव है। जब बूँद समुद्र में मिल जाती है — वह समुद्र बन जाती है। ऐसी ही अवस्था।

6.24–27 एक यात्रा है — कामनाओं का त्याग, मन को आत्मा में लाना, भटकने पर वापस लाना, और अंत में — परम सुख। यह क्रमिक साधना का वर्णन है।

सांख्यदर्शन में रजोगुण — गतिशीलता और बेचैनी का गुण — है। जब रज शांत होता है, तो सत्त्व प्रकट होता है। गीता का 'शान्तरजस' यही है।

अध्याय 6 · 27 / 47
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