📿 श्लोक संग्रह

यतो यतो निश्चरति

गीता 6.26 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥
यतः यतः निश्चरति
जहाँ-जहाँ जाता है
मनः चञ्चलम् अस्थिरम्
चंचल और अस्थिर मन
ततः ततः नियम्य
वहाँ-वहाँ से रोककर
एतत् आत्मनि एव
इसे आत्मा में ही
वशम् नयेत्
वश में लाए

यह ध्यान के अभ्यास का सबसे सरल और ईमानदार निर्देश है। मन भागेगा — यह तय है। कहाँ-कहाँ जाए? जहाँ-जहाँ जाए, वहाँ से उठाकर वापस आत्मा में लाओ। बार-बार। हर बार।

यह थकाने वाला काम लग सकता है। पर इसे इस तरह देखो — जैसे एक माँ अपने छोटे बच्चे को बार-बार उठाकर सही जगह बिठाती है। प्यार से, धैर्य से। मन के साथ भी ऐसे ही व्यवहार करो — क्रोध से नहीं, धैर्य से।

यह गीता का सबसे व्यावहारिक ध्यान-निर्देश है। 6.25 में कहा था — 'शनैः शनैः' धीरे जाओ। 6.26 में कहा — जब मन भागे, वापस लाओ। यही अभ्यास है।

परंपरागत ध्यान-शिक्षा में गुरु यही सिखाते हैं — मन को बार-बार वापस लाना ही ध्यान है। एक बार में लग जाए — ऐसा नहीं होता। हर बार वापस लाना ही साधना है।

अध्याय 6 · 26 / 47
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