📿 श्लोक संग्रह

शनैः शनैरुपरमेत्

गीता 6.25 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥
शनैः शनैः
धीरे-धीरे
उपरमेत्
विरति पाए, रुके
बुद्ध्या धृतिगृहीतया
धैर्य से पकड़ी बुद्धि से
आत्मसंस्थम् मनः कृत्वा
मन को आत्मा में स्थिर करके
न किञ्चित् अपि चिन्तयेत्
कुछ भी न सोचे

यह श्लोक बहुत व्यावहारिक और धैर्यपूर्ण निर्देश देता है। 'शनैः शनैः' — धीरे-धीरे। कोई जल्दबाजी नहीं। बुद्धि को धैर्य से मज़बूत पकड़ो और मन को आत्मा में ले जाओ। बस इतना — और कुछ मत सोचो।

'न किञ्चिदपि चिन्तयेत्' — कुछ भी मत सोचो। यह ध्यान की अंतिम अवस्था है। पर यहाँ पहुँचने का रास्ता धीरे-धीरे है, जल्दी से नहीं। जैसे बहुत गर्म चाय को ठंडा होने में समय लगता है — मन को शांत होने में भी समय लगता है।

6.24–25 एक साथ हैं। पहले कामनाएँ छोड़ो, इन्द्रियाँ रोको — अब धीरे-धीरे मन को ठहराओ। यह क्रमिक विधि है — एक दिन में सब नहीं होता।

पतञ्जलि के योगसूत्र में 'अभ्यास-वैराग्याभ्यां तन्निरोधः' — अभ्यास और वैराग्य से मन नियंत्रित होता है। गीता का 'शनैः शनैः' वही 'अभ्यास' की बात है।

अध्याय 6 · 25 / 47
अध्याय 6 · 25 / 47 अगला →