📿 श्लोक संग्रह

सङ्कल्पप्रभवान्कामान्

गीता 6.24 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥
सङ्कल्पप्रभवान्
संकल्प से उत्पन्न
कामान् त्यक्त्वा
कामनाओं को छोड़कर
सर्वान् अशेषतः
सभी को बिना शेष
मनसा एव
मन से ही
इन्द्रियग्रामम्
इन्द्रियों के समूह को
विनियम्य समन्ततः
सब ओर से नियंत्रित करके

यह श्लोक 6.23 के 'दृढ़ निश्चय से अभ्यास करो' के बाद व्यावहारिक विधि बताता है। पहला काम — सब संकल्पों से उत्पन्न कामनाओं को बिना बचाए पूरी तरह छोड़ो। फिर — मन से ही इन्द्रियों को सब दिशाओं से रोको।

ध्यान रहे — यहाँ 'मनसैव' — मन से ही — कहा गया है। इन्द्रियों को बाहर से रोकने से काम नहीं चलता। मन जब तक भीतर से रोकना न सीखे, इन्द्रियाँ बाहर से बाँधी रहें तो भी मन में विषय घूमते रहते हैं।

6.24–25 एक इकाई हैं — दोनों मिलकर योगाभ्यास की क्रमिक विधि बताते हैं। पहले कामनाएँ छोड़ो (6.24), फिर धीरे-धीरे बुद्धि के बल पर मन को आत्मा में लगाओ (6.25)।

'संकल्पप्रभव' — संकल्प से कामनाएँ जन्म लेती हैं। संकल्प बंद हो तो कामना का बीज ही नहीं पड़ता। इसीलिए 6.2 में भी 'सर्वसंकल्पसंन्यासी' कहा था।

अध्याय 6 · 24 / 47
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