यह श्लोक 6.23 के 'दृढ़ निश्चय से अभ्यास करो' के बाद व्यावहारिक विधि बताता है। पहला काम — सब संकल्पों से उत्पन्न कामनाओं को बिना बचाए पूरी तरह छोड़ो। फिर — मन से ही इन्द्रियों को सब दिशाओं से रोको।
ध्यान रहे — यहाँ 'मनसैव' — मन से ही — कहा गया है। इन्द्रियों को बाहर से रोकने से काम नहीं चलता। मन जब तक भीतर से रोकना न सीखे, इन्द्रियाँ बाहर से बाँधी रहें तो भी मन में विषय घूमते रहते हैं।