यह श्लोक बहुत व्यावहारिक और धैर्यपूर्ण निर्देश देता है। 'शनैः शनैः' — धीरे-धीरे। कोई जल्दबाजी नहीं। बुद्धि को धैर्य से मज़बूत पकड़ो और मन को आत्मा में ले जाओ। बस इतना — और कुछ मत सोचो।
'न किञ्चिदपि चिन्तयेत्' — कुछ भी मत सोचो। यह ध्यान की अंतिम अवस्था है। पर यहाँ पहुँचने का रास्ता धीरे-धीरे है, जल्दी से नहीं। जैसे बहुत गर्म चाय को ठंडा होने में समय लगता है — मन को शांत होने में भी समय लगता है।