कृष्ण अर्जुन को बताते हैं — हे पाण्डव, लोग जिसे संन्यास कहते हैं, उसे तुम योग समझो। दोनों में कोई फर्क नहीं। संन्यास का असली अर्थ है संकल्पों का त्याग — 'मुझे यह मिले, वह मिले' — ऐसी कामनाओं का छोड़ना।
जो व्यक्ति अभी भी मन में तरह-तरह के फल-संकल्प लिए बैठा है, वह भले ही गेरुए वस्त्र पहन ले — योगी नहीं बन सकता। योग भीतर से होता है, बाहर से नहीं।