गीता की सबसे सुंदर उपमाओं में से एक है यह। कृष्ण कहते हैं — जिस जगह हवा न हो, वहाँ रखा दीपक बिल्कुल सीधा जलता है। उसकी लौ न इधर झुकती है, न उधर। बस एक शांत, सीधी रोशनी। ठीक वैसे ही वह योगी है जिसका मन नियंत्रित है।
हमारा मन उस दीपक की लौ जैसा है। जब विचारों की हवा आती है — वह काँपता है, भटकता है। जब हवाएँ रुक जाएँ — तब लौ स्थिर हो जाती है। ध्यान की साधना उसी निर्वात-स्थान को भीतर बनाने की कोशिश है।