अब कृष्ण 'युक्त' की सबसे स्पष्ट परिभाषा देते हैं। जब मन पूरी तरह नियंत्रित होकर आत्मा में ही ठहर जाए — बाहर न जाए, किसी विषय की ओर न खिंचे — और जब सब कामनाओं से मुक्त हो जाए — तब उसे युक्त कहते हैं।
यह अवस्था कठिन है लेकिन असंभव नहीं। जैसे एक बच्चा जब कोई काम पूरे मन से करता है — तब उसे और कुछ याद ही नहीं रहता। उसी एकाग्रता का परिपक्व रूप ही 'युक्त' अवस्था है — जहाँ आत्मा ही एकमात्र अनुभव बन जाती है।