📿 श्लोक संग्रह

युक्ताहारविहारस्य

गीता 6.17 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥
युक्त-आहार-विहारस्य
संयमित आहार-विहार वाले का
युक्तचेष्टस्य कर्मसु
कर्मों में संयमित प्रयत्न वाले का
युक्त-स्वप्न-अवबोधस्य
नींद-जागरण में संतुलित
योगः भवति
योग होता है
दुःखहा
दुख को नाश करने वाला

6.16 में कहा था — अति मत करो। 6.17 में बताया — सही मात्रा में करो तो क्या होगा। जो आहार-विहार में संयम रखे, काम में उचित परिश्रम करे, नींद और जागरण में संतुलन रखे — उसका योग दुख को नाश करता है।

यह तीन चीजें हैं — खाना-पीना, काम-काज, नींद। तीनों में जब मध्यम मार्ग हो, तब जीवन में स्थिरता आती है। और जब जीवन स्थिर हो, तब ध्यान लगता है। ध्यान लगे तो दुख कम होते जाते हैं।

यह श्लोक 6.16 का सकारात्मक रूप है — वहाँ बताया था क्या नहीं करना, यहाँ बताया क्या करना। 'दुःखहा' — दुख का नाश करने वाला — यह योग का व्यावहारिक फल है।

आयुर्वेद में दिनचर्या और ऋतुचर्या का यही आधार है। नियमित और संयमित जीवन शरीर और मन दोनों को स्वस्थ रखता है — गीता यहाँ उसी बात को आध्यात्मिक दृष्टि से कहती है।

अध्याय 6 · 17 / 47
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