📿 श्लोक संग्रह

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति

गीता 6.16 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥
न अत्यश्नतः
बहुत खाने वाले का नहीं
तु योगः अस्ति
योग होता है
न च एकान्तम् अनश्नतः
न बिल्कुल न खाने वाले का
न च अतिस्वप्नशीलस्य
न बहुत सोने के स्वभाव वाले का
जाग्रतः न एव च
और न सदा जागते रहने वाले का
अर्जुन
हे अर्जुन

कृष्ण मध्यम मार्ग की बात करते हैं। चार प्रकार के लोगों को योग नहीं होता — बहुत खाने वाले को, बिल्कुल न खाने वाले को, बहुत सोने वाले को, और बिल्कुल न सोने वाले को। दोनों अतियाँ — अति भोग और अति तप — योग के लिए बाधा हैं।

यह बात बहुत व्यावहारिक है। शरीर को इतना कमज़ोर मत करो कि ध्यान बैठे भी न जाए। और इतना पुष्ट भी मत करो कि मन आलसी हो जाए। बीच का रास्ता — संतुलन — यही योग का आधार है।

बुद्ध ने भी तपस्या के बाद मध्यम मार्ग अपनाया था। गीता में भी यही सिद्धांत है — अति नहीं, मध्यम मार्ग। 6.17 में अगला श्लोक इसी मध्यम मार्ग को और स्पष्ट करता है।

परंपरागत आयुर्वेद में भी 'हित-मित-भोजन' — उचित और परिमित भोजन — को स्वास्थ्य का आधार माना गया है। गीता यहाँ उसी सिद्धांत को आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में रखती है।

अध्याय 6 · 16 / 47
अध्याय 6 · 16 / 47 अगला →