यह श्लोक ध्यान-खंड (6.10–15) का समापन करता है। कृष्ण कहते हैं — जो योगी इस विधि से निरंतर अभ्यास करता है, जिसका मन नियंत्रित है — वह परम शांति पाता है। उस शांति को वे 'निर्वाणपरम' कहते हैं — शांति की सबसे ऊँची अवस्था।
और यह शांति कहाँ है? कृष्ण कहते हैं — 'मत्संस्थाम्' — मुझमें स्थित। यानी परम शांति और परमात्मा अलग नहीं। जो परमात्मा को पा लेता है, उसे शांति मिल जाती है। जो शांति पा लेता है, उसे परमात्मा मिल जाते हैं।