📿 श्लोक संग्रह

युञ्जन्नेवं सदात्मानम्

गीता 6.15 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥
युञ्जन् एवम् सदा
इस प्रकार सदा जोड़ते हुए
आत्मानम्
अपने आप को
योगी नियतमानसः
नियंत्रित मनवाला योगी
शान्तिम्
शांति को
निर्वाणपरमाम्
परम निर्वाण — शांति की पराकाष्ठा
मत्संस्थाम्
मुझमें स्थित
अधिगच्छति
पाता है, प्राप्त करता है

यह श्लोक ध्यान-खंड (6.10–15) का समापन करता है। कृष्ण कहते हैं — जो योगी इस विधि से निरंतर अभ्यास करता है, जिसका मन नियंत्रित है — वह परम शांति पाता है। उस शांति को वे 'निर्वाणपरम' कहते हैं — शांति की सबसे ऊँची अवस्था।

और यह शांति कहाँ है? कृष्ण कहते हैं — 'मत्संस्थाम्' — मुझमें स्थित। यानी परम शांति और परमात्मा अलग नहीं। जो परमात्मा को पा लेता है, उसे शांति मिल जाती है। जो शांति पा लेता है, उसे परमात्मा मिल जाते हैं।

यह 6.10 से शुरू हुए ध्यान-खंड का अंतिम श्लोक है। पाँच श्लोकों में कृष्ण ने स्थान, आसन, मुद्रा, भीतरी अवस्था और अंतिम फल — सब बता दिया।

'निर्वाण' शब्द बौद्ध परंपरा में भी प्रयुक्त होता है — 'शांत होना, बुझना'। यहाँ गीता में यही शब्द 'परम शांति' के अर्थ में आया है, जो परमात्मा में स्थित है।

अध्याय 6 · 15 / 47
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