यहाँ कृष्ण ध्यान की आंतरिक अवस्था बताते हैं। बाहर शरीर स्थिर हो (6.13) — भीतर मन शांत हो, भय से मुक्त हो। ब्रह्मचर्यव्रत का पालन हो — अर्थात् इन्द्रियों का संयम। मन नियंत्रित करके कृष्ण पर ध्यान लगाओ।
अंत में कृष्ण कहते हैं — 'मत्परः' — मुझे ही परम जानते हुए बैठो। यह भक्तियोग का स्पर्श है। ध्यान की विधि चाहे जो हो, अंतिम लक्ष्य परमात्मा ही है।