📿 श्लोक संग्रह

नैव किञ्चित्करोमीति

गीता 5.8 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् ॥
न एव
नहीं ही
किञ्चित्
कुछ भी
करोमि
मैं करता हूँ
इति
ऐसा
युक्तः
योगयुक्त
मन्येत
मानता है
तत्त्ववित्
तत्व को जानने वाला
पश्यन्
देखते हुए
शृण्वन्
सुनते हुए
स्पृशन्
छूते हुए
जिघ्रन्
सूँघते हुए
अश्नन्
खाते हुए
गच्छन्
चलते हुए
स्वपन्
सोते हुए
श्वसन्
साँस लेते हुए

कृष्ण कहते हैं — तत्त्व को जानने वाला योगी यह मानता है कि 'मैं कुछ नहीं कर रहा।' देखना, सुनना, छूना, सूँघना, खाना, चलना, सोना, साँस लेना — ये सब होता रहता है, पर 'मैं' नहीं कर रहा।

यह बहुत गहरी बात है। जैसे नदी बहती है — पानी बह रहा है, पत्थर रास्ते में आते हैं, किनारे बदलते हैं। नदी कुछ 'करती' नहीं — बस प्रकृति के नियम से बहती है। योगी भी ऐसे ही जानता है कि उसके कर्म इंद्रियों और विषयों का खेल है, उसका 'मैं' उसमें नहीं है।

यह श्लोक (5.8) और अगला श्लोक (5.9) साथ मिलकर एक विचार पूरा करते हैं। इन्हें 'नैव किञ्चित्' युगल कहा जाता है।

परंपरा में इन दोनों श्लोकों में इंद्रियों की क्रियाओं की सूची को प्रतीकात्मक माना गया है — ये सब कर्म शरीर और प्रकृति के स्तर पर हैं, आत्मा के स्तर पर नहीं।

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