📿 श्लोक संग्रह

योगयुक्तो विशुद्धात्मा

गीता 5.7 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥
योगयुक्तः
योग में स्थित
विशुद्धात्मा
शुद्ध अंतःकरण वाला
विजितात्मा
मन को जीतने वाला
जितेन्द्रियः
इंद्रियों को वश में रखने वाला
सर्वभूतात्मभूतात्मा
सब प्राणियों की आत्मा में अपनी आत्मा देखने वाला
कुर्वन्
कर्म करते हुए
अपि
भी
न लिप्यते
नहीं बँधता, नहीं लिपटता

यह श्लोक योगी की पहचान बताता है। योग में स्थित, मन को जीता हुआ, इंद्रियों को वश में किए हुए — ऐसा व्यक्ति सब प्राणियों में अपनी आत्मा देखता है।

और सबसे बड़ी बात — ऐसा व्यक्ति कर्म करते हुए भी पाप या बंधन से नहीं लिपटता। जैसे कमल का फूल कीचड़ में रहकर भी कीचड़ से अछूता रहता है — वैसे ही योगी संसार में रहते हुए भी संसार के बंधन से मुक्त रहता है।

यह श्लोक कर्मयोग की पूर्णता को चित्रित करता है। यहाँ कृष्ण बताते हैं कि योग केवल आसन नहीं है — यह मन, बुद्धि और इंद्रियों की समग्र स्थिरता है।

परंपरा में 'सर्वभूतात्मभूतात्मा' पद को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है — इसका अर्थ है कि योगी अपनी आत्मा और सबकी आत्मा में भेद नहीं करता।

अध्याय 5 · 7 / 29
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