📿 श्लोक संग्रह

सांख्ययोगौ पृथग्बालाः

गीता 5.4 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग
सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ॥
सांख्ययोगौ
सांख्य और योग को
पृथक्
अलग-अलग
बालाः
अज्ञानी लोग
प्रवदन्ति
कहते हैं
नहीं
पण्डिताः
विद्वान, ज्ञानी
एकम्
एक को भी
अपि
भी
आस्थितः
ठीक से अपनाने वाला
सम्यक्
भली-भाँति
उभयोः
दोनों का
विन्दते
प्राप्त करता है
फलम्
फल

कृष्ण कहते हैं — सांख्य और योग को अलग-अलग मानना केवल कम समझ वाले लोगों की बात है। जो सचमुच जानते हैं, वे जानते हैं कि दोनों एक ही सत्य तक पहुँचाते हैं।

जैसे गाँव जाने के दो रास्ते हों — एक पहाड़ से होकर, एक नदी के किनारे-किनारे। मंज़िल एक ही है। जो किसी एक रास्ते पर भी ध्यान से, पूरे मन से चले — वह पहुँच जाएगा। दोनों रास्तों का फल एक ही है।

यह श्लोक ज्ञानमार्ग (सांख्य) और कर्ममार्ग (योग) की एकता को स्थापित करता है। कृष्ण यहाँ किसी एक मार्ग को श्रेष्ठ नहीं बता रहे — दोनों मान्य हैं।

परंपरा में यह विचार महत्वपूर्ण रहा है कि साधना में बाहरी विधि से अधिक आंतरिक निष्ठा महत्वपूर्ण है।

अध्याय 5 · 4 / 29
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