काम और क्रोध से मुक्त, मन को वश में किए हुए, आत्मा को जानने वाले यतियों के लिए ब्रह्मनिर्वाण चारों ओर है।
यहाँ 'अभितः' — चारों ओर — बड़ा सुंदर शब्द है। जैसे दीपक के चारों ओर प्रकाश होता है, उसे ढूँढना नहीं पड़ता — वैसे ही ऐसे संतों के लिए ब्रह्म की शांति सर्वत्र है।