📿 श्लोक संग्रह

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणम्

गीता 5.25 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥
लभन्ते
पाते हैं
ब्रह्मनिर्वाणम्
ब्रह्म की शांति, मोक्ष
ऋषयः
ऋषि, ज्ञानी
क्षीणकल्मषाः
जिनके पाप क्षीण हो गए
छिन्नद्वैधाः
जिनके संशय कट गए
यतात्मानः
जिन्होंने मन को वश में किया
सर्वभूतहिते
सब प्राणियों के हित में
रताः
लगे हुए

जिन ऋषियों के पाप क्षीण हो गए, संशय कट गए, मन वश में है, और जो सब प्राणियों के हित में लगे हैं — वे ब्रह्मनिर्वाण पाते हैं।

यहाँ चार गुण बताए गए हैं। पाप-मुक्ति, संशय-मुक्ति, मन का संयम, और सबके भले की चाहत। ये चारों मिलें तो ब्रह्म की शांति मिलती है। अकेला एक गुण काफ़ी नहीं।

यह श्लोक 5.24 के बाद आता है और उसी ब्रह्मनिर्वाण की बात जारी रखता है। यहाँ 'सर्वभूतहिते रताः' — सबके हित में लगे — पद बहुत महत्वपूर्ण है।

परंपरा में यह माना गया है कि केवल व्यक्तिगत साधना नहीं, समाज के प्रति उत्तरदायित्व भी मुक्ति का अंग है।

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