📿 श्लोक संग्रह

योऽन्तःसुखोऽन्तरारामः

गीता 5.24 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥
यः
जो
अन्तःसुखः
भीतर सुख वाला
अन्तरारामः
भीतर आराम वाला
तथा
उसी प्रकार
अन्तर्ज्योतिः
भीतर प्रकाश वाला
एव
ही
यः
जो
सः
वह
योगी
योगी
ब्रह्मनिर्वाणम्
ब्रह्म की शांति, मोक्ष
ब्रह्मभूतः
ब्रह्मरूप होकर
अधिगच्छति
प्राप्त करता है

जिस योगी का सुख भीतर है, आराम भीतर है, प्रकाश भीतर है — वह ब्रह्मरूप होकर ब्रह्मनिर्वाण पाता है।

यह तीन 'भीतर' बड़े महत्वपूर्ण हैं — सुख, आराम, और ज्योति। जो बाहर खोजते हैं वे भटकते हैं। जिसे ये तीनों भीतर मिल गए, उसे बाहर की ज़रूरत नहीं रहती। वह मुक्त है।

यह श्लोक 'ब्रह्मनिर्वाण' शब्द का उपयोग करता है — गीता में यह पद कई बार आता है। इसका अर्थ है ब्रह्म में लीन होकर शांति पाना।

परंपरा में यह माना गया है कि भीतरी ज्योति का उदय ही आत्मज्ञान की निशानी है।

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