जिस योगी का सुख भीतर है, आराम भीतर है, प्रकाश भीतर है — वह ब्रह्मरूप होकर ब्रह्मनिर्वाण पाता है।
यह तीन 'भीतर' बड़े महत्वपूर्ण हैं — सुख, आराम, और ज्योति। जो बाहर खोजते हैं वे भटकते हैं। जिसे ये तीनों भीतर मिल गए, उसे बाहर की ज़रूरत नहीं रहती। वह मुक्त है।