📿 श्लोक संग्रह

शक्नोतीहैव यः सोढुम्

गीता 5.23 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥
शक्नोति
सक्षम है
इह एव
यहीं, इसी जीवन में
यः
जो
सोढुम्
सहन करने में
प्राक्
पहले
शरीरविमोक्षणात्
शरीर छोड़ने से
कामक्रोधोद्भवम्
काम और क्रोध से उत्पन्न
वेगम्
वेग, आवेग
सः
वह
युक्तः
योगी
सः सुखी
वही सुखी है
नरः
मनुष्य

कृष्ण कहते हैं — जो मनुष्य शरीर छोड़ने से पहले, इसी जीवन में, काम और क्रोध के आवेग को सह सकता है — वही योगी है, वही सुखी है।

जैसे आँधी में दीपक बुझ जाता है, पर जो दीपक हथेली की ओट में हो, वह टिका रहता है। काम और क्रोध बड़े वेग से आते हैं। जो इनके आते ही बह नहीं जाता — थोड़ा रुकता है — वह सुखी है।

यह श्लोक व्यावहारिक साधना की बात करता है। 'इहैव' — इसी जीवन में — यह बार-बार गीता में आता है, यह संकेत देते हुए कि मोक्ष और सुख के लिए मृत्यु की प्रतीक्षा नहीं करनी।

परंपरा में काम और क्रोध को बंधन के दो मुख्य द्वार माना गया है। यह श्लोक इनसे मुक्ति की पहली शर्त बताता है — सहन करने की क्षमता।

अध्याय 5 · 23 / 29
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