कृष्ण कहते हैं — जो मनुष्य शरीर छोड़ने से पहले, इसी जीवन में, काम और क्रोध के आवेग को सह सकता है — वही योगी है, वही सुखी है।
जैसे आँधी में दीपक बुझ जाता है, पर जो दीपक हथेली की ओट में हो, वह टिका रहता है। काम और क्रोध बड़े वेग से आते हैं। जो इनके आते ही बह नहीं जाता — थोड़ा रुकता है — वह सुखी है।