जो बाहरी विषयों में आसक्त नहीं है, वह भीतर से आनंद पाता है। ऐसा ब्रह्मयोगी अक्षय — कभी न खत्म होने वाला — सुख पाता है।
जैसे एक दीपक बाहर तेज़ हवा हो तो बुझ जाता है — पर जो दीपक भीतर के कमरे में जले, हवा उसे नहीं बुझा सकती। भीतर का आनंद बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करता।