कृष्ण कहते हैं — ब्रह्म को जानने वाला प्रिय मिलने पर उछलता नहीं, और अप्रिय मिलने पर घबराता नहीं। उसकी बुद्धि स्थिर है, मोह नहीं है — वह ब्रह्म में टिका है।
जैसे एक पुराना पेड़ — चाहे तेज़ आँधी आए, चाहे बारिश हो या धूप — वह जड़ से हिलता नहीं। ब्रह्मज्ञानी की स्थिति ऐसी ही होती है। अच्छे-बुरे दोनों उसे हिला नहीं पाते।