📿 श्लोक संग्रह

नादत्ते कस्यचित्पापं

गीता 5.15 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥
न आदत्ते
ग्रहण नहीं करता
कस्यचित्
किसी का भी
पापम्
पाप
न च एव
और न ही
सुकृतम्
पुण्य
विभुः
सर्वव्यापी परमात्मा
अज्ञानेन
अज्ञान से
आवृतम्
ढका हुआ
ज्ञानम्
ज्ञान
तेन
उससे
मुह्यन्ति
मोहित होते हैं
जन्तवः
प्राणी

कृष्ण कहते हैं — सर्वव्यापी परमात्मा किसी का पाप नहीं लेते, किसी का पुण्य भी नहीं। वे निर्लिप्त हैं। तो फिर प्राणी इतना क्यों भटकते हैं? क्योंकि ज्ञान अज्ञान से ढका हुआ है।

जैसे बादल सूर्य को नहीं ढकता — सूर्य तो वैसे ही चमकता रहता है। पर जब घने बादल आते हैं तो हमें सूर्य दिखता नहीं। ऐसे ही अज्ञान ज्ञान को ढक लेता है — और हम भटकते हैं।

यह श्लोक 5.14 की बात को आगे बढ़ाता है। ईश्वर कर्मफल के स्वामी नहीं हैं — और जो यह नहीं जानते, वे अज्ञान में हैं।

परंपरा में अज्ञान को माया का आवरण माना गया है। ज्ञान के उदय से यह आवरण हटता है — अगला श्लोक (5.16) यही कहता है।

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