📿 श्लोक संग्रह

युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा

गीता 5.12 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥
युक्तः
योगयुक्त
कर्मफलम्
कर्म के फल को
त्यक्त्वा
छोड़कर
शान्तिम्
शांति
आप्नोति
पाता है
नैष्ठिकीम्
स्थायी, अटल
अयुक्तः
अयोगी
कामकारेण
इच्छा के वश में होकर
फले
फल में
सक्तः
आसक्त
निबध्यते
बँध जाता है

जो योगयुक्त है वह कर्म के फल को छोड़कर स्थायी शांति पाता है। जो अयोगी है, इच्छाओं के वश में होकर फल में आसक्त है — वह बँध जाता है।

सोचो — एक बच्चा जब किसी काम में मन लगाकर पढ़ता है, तो सीखने का आनंद मिलता है। जो बच्चा केवल नंबर के लिए पढ़ता है, वह परीक्षा के बाद खाली महसूस करता है। यही अंतर है युक्त और अयुक्त में।

यह श्लोक कर्मयोग का परिणाम बताता है। 'नैष्ठिकीम् शान्तिम्' — अटल, स्थायी शांति — यह कर्मफल-त्याग से मिलती है।

परंपरा में यह माना गया है कि आसक्ति ही बंधन का मूल कारण है, कर्म नहीं। इसलिए कर्म करते रहो, आसक्ति छोड़ो।

अध्याय 5 · 12 / 29
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