जो योगयुक्त है वह कर्म के फल को छोड़कर स्थायी शांति पाता है। जो अयोगी है, इच्छाओं के वश में होकर फल में आसक्त है — वह बँध जाता है।
सोचो — एक बच्चा जब किसी काम में मन लगाकर पढ़ता है, तो सीखने का आनंद मिलता है। जो बच्चा केवल नंबर के लिए पढ़ता है, वह परीक्षा के बाद खाली महसूस करता है। यही अंतर है युक्त और अयुक्त में।