📿 श्लोक संग्रह

कायेन मनसा बुद्ध्या

गीता 5.11 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि ।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये ॥
कायेन
शरीर से
मनसा
मन से
बुद्ध्या
बुद्धि से
केवलैः
केवल
इन्द्रियैः
इंद्रियों से
अपि
भी
योगिनः
योगी
कर्म
कर्म
कुर्वन्ति
करते हैं
सङ्गम्
आसक्ति को
त्यक्त्वा
छोड़कर
आत्मशुद्धये
आत्मा की शुद्धि के लिए

योगी शरीर से, मन से, बुद्धि से, इंद्रियों से — कर्म करते हैं। लेकिन आसक्ति छोड़कर। और उद्देश्य क्या है? आत्मा की शुद्धि।

जैसे कोई बुज़ुर्ग दादी रोज़ घर की सफ़ाई करती हैं — न किसी की तारीफ़ के लिए, न इनाम के लिए। बस यह उनका स्वभाव है, उनकी साधना है। ऐसे ही योगी का हर कर्म भीतर की शुद्धि का साधन बन जाता है।

यह श्लोक कर्मयोग के उद्देश्य को स्पष्ट करता है — कर्म त्याग के लिए नहीं, आत्मशुद्धि के लिए। यही अंतर आसक्त कर्म और योगी के कर्म में है।

परंपरा में आत्मशुद्धि को कर्मयोग का प्रथम लक्ष्य माना गया है। चित्त शुद्ध होने पर ज्ञान का उदय स्वाभाविक होता है।

अध्याय 5 · 11 / 29
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