योगी शरीर से, मन से, बुद्धि से, इंद्रियों से — कर्म करते हैं। लेकिन आसक्ति छोड़कर। और उद्देश्य क्या है? आत्मा की शुद्धि।
जैसे कोई बुज़ुर्ग दादी रोज़ घर की सफ़ाई करती हैं — न किसी की तारीफ़ के लिए, न इनाम के लिए। बस यह उनका स्वभाव है, उनकी साधना है। ऐसे ही योगी का हर कर्म भीतर की शुद्धि का साधन बन जाता है।