📿 श्लोक संग्रह

संन्यासं कर्मणां

गीता 5.1 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥
संन्यासम्
संन्यास को, त्याग को
कर्मणाम्
कर्मों का
कृष्ण
हे कृष्ण
पुनः
फिर
योगम्
कर्मयोग को
और
शंससि
प्रशंसा करते हो
यत्
जो
श्रेयः
अधिक कल्याणकारी
एतयोः
इन दोनों में से
एकम्
एक
तत्
वह
मे
मुझे
ब्रूहि
बताइए
सुनिश्चितम्
निश्चित रूप से

अर्जुन भगवान कृष्ण से एक सीधा सवाल पूछ रहे हैं। वे कहते हैं — 'कभी आप कर्मों के संन्यास की बात करते हैं, कभी कर्मयोग की। मेरा मन उलझ गया है। आप साफ़ बताइए — इन दोनों में कौन सा रास्ता बेहतर है?'

यह सवाल बड़ा स्वाभाविक है। जैसे कोई बच्चा दादा-दादी से पूछे — 'दादाजी, आप कहते हो कम बोलो, और कभी कहते हो खुलकर बोलो — तो असल में क्या करूँ?' अर्जुन की उलझन भी ऐसी ही थी। वे केवल एक स्पष्ट उत्तर चाहते थे।

यह श्लोक पाँचवें अध्याय का द्वार है। अर्जुन का यह प्रश्न ही अध्याय की नींव है।

यह श्लोक भगवद्गीता के पाँचवें अध्याय कर्मसंन्यासयोग का पहला श्लोक है। चौथे अध्याय में कृष्ण ने ज्ञानयोग और कर्मत्याग की बात की थी। उससे अर्जुन के मन में भ्रम उत्पन्न हुआ।

परंपरा में यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। इससे आगे के पूरे अध्याय में कृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि संन्यास और कर्मयोग वास्तव में अलग नहीं हैं।

अध्याय 5 · 1 / 29
अध्याय 5 · 1 / 29 अगला →