अर्जुन भगवान कृष्ण से एक सीधा सवाल पूछ रहे हैं। वे कहते हैं — 'कभी आप कर्मों के संन्यास की बात करते हैं, कभी कर्मयोग की। मेरा मन उलझ गया है। आप साफ़ बताइए — इन दोनों में कौन सा रास्ता बेहतर है?'
यह सवाल बड़ा स्वाभाविक है। जैसे कोई बच्चा दादा-दादी से पूछे — 'दादाजी, आप कहते हो कम बोलो, और कभी कहते हो खुलकर बोलो — तो असल में क्या करूँ?' अर्जुन की उलझन भी ऐसी ही थी। वे केवल एक स्पष्ट उत्तर चाहते थे।
यह श्लोक पाँचवें अध्याय का द्वार है। अर्जुन का यह प्रश्न ही अध्याय की नींव है।