📿 श्लोक संग्रह

परित्राणाय साधूनां

गीता 4.8 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
परित्राणाय
रक्षा के लिए
साधूनाम्
सज्जनों की
विनाशाय
नाश के लिए
और
दुष्कृताम्
दुष्कर्म करने वालों का
धर्मसंस्थापनार्थाय
धर्म की स्थापना के लिए
सम्भवामि
प्रकट होता हूँ
युगे युगे
हर युग में

यह श्लोक गीता 4.7 का अगला भाग है। पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा था कि जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब मैं प्रकट होता हूँ। इस श्लोक में वे बताते हैं कि उनके आने का उद्देश्य क्या है — अच्छे लोगों की रक्षा करना, बुरे लोगों का नाश करना, और धर्म को फिर से स्थापित करना।

इसे ऐसे समझो — जैसे गाँव में जब चोर बहुत बढ़ जाते हैं तो पुलिस आती है। पुलिस का काम है भले लोगों को बचाना और चोरों को पकड़ना। भगवान भी यही करते हैं, लेकिन बहुत बड़े पैमाने पर — पूरे संसार के स्तर पर।

सबसे सुंदर बात है अंतिम शब्द — 'युगे युगे'। भगवान एक बार नहीं, बार-बार आते हैं। जब भी ज़रूरत होती है, वे किसी-न-किसी रूप में प्रकट हो जाते हैं। यह संदेश बड़ा आश्वासनकारी है — बुराई कितनी भी बढ़े, भगवान आएँगे।

यह श्लोक भगवद्गीता के चौथे अध्याय से है। यह श्लोक 4.7 के ठीक बाद आता है और दोनों मिलकर अवतार सिद्धांत का पूरा चित्र प्रस्तुत करते हैं। परंपरा में इन दोनों श्लोकों को एक साथ याद किया जाता रहा है।

पुराणों में दशावतार (भगवान विष्णु के दस अवतार) की कथाएँ इसी सिद्धांत पर आधारित मानी जाती रही हैं — हर अवतार किसी-न-किसी अधर्म के नाश और धर्म की पुनर्स्थापना के लिए आया।

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