📿 श्लोक संग्रह

जन्म कर्म च मे दिव्यम्

गीता 4.9 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥
जन्म
जन्म
कर्म
कर्म
मे
मेरा
दिव्यम्
दिव्य, अलौकिक
एवम्
इस प्रकार
यः
जो
वेत्ति
जानता है
तत्त्वतः
तत्त्व से, सच्चाई से
त्यक्त्वा
छोड़कर
देहम्
शरीर को
पुनर्जन्म
फिर से जन्म
नैति
नहीं लेता
माम्
मुझे
एति
प्राप्त होता है

कृष्ण कहते हैं कि जो मनुष्य मेरे जन्म और कर्म को दिव्य — यानी साधारण नहीं, अलौकिक — समझकर जानता है, वह शरीर छोड़ने के बाद फिर से जन्म नहीं लेता और मुझे ही प्राप्त होता है। यह जानना केवल बौद्धिक नहीं है — यह हृदय से जानना है, जैसे माँ को पता होता है कि उसके बच्चे के रोने का क्या अर्थ है।

यह श्लोक एक बड़ी बात कहता है — भगवान को सच्चाई से जानना मोक्ष का द्वार है। इस जानने में भक्ति, ज्ञान और समर्पण — तीनों शामिल हैं।

4.7 और 4.8 में कृष्ण ने अवतार का उद्देश्य बताया था। यह श्लोक उसका फल बताता है — जो इस रहस्य को जानता है, उसे मोक्ष मिलता है।

अगला श्लोक (4.10) उन लोगों का वर्णन करता है जो भूतकाल में इसी ज्ञान से मुक्त हुए।

अध्याय 4 · 9 / 42
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