📿 श्लोक संग्रह

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा

गीता 4.6 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥
अजः
अजन्मा
अपि
होते हुए भी
अव्ययात्मा
अविनाशी आत्मा वाला
भूतानाम्
प्राणियों का
ईश्वरः
ईश्वर
प्रकृतिम्
प्रकृति को
स्वाम्
अपनी
अधिष्ठाय
आश्रय लेकर
सम्भवामि
प्रकट होता हूँ
आत्ममायया
अपनी माया से

कृष्ण का उत्तर यहाँ बड़ा गहरा है। वे कहते हैं — मैं अजन्मा हूँ, मेरा नाश नहीं होता, मैं समस्त प्राणियों का ईश्वर हूँ — फिर भी अपनी प्रकृति को आश्रय लेकर, अपनी माया से प्रकट होता हूँ। जैसे सूर्य आकाश में सदा है, लेकिन पानी में उसका प्रतिबिम्ब दिखता है — सूर्य उतरा नहीं, पर दिखता है।

यह श्लोक अवतार के रहस्य को समझाता है। भगवान का प्रकट होना उनकी परतंत्रता नहीं, उनकी इच्छाशक्ति है। वे माया से बंधे नहीं हैं — वे माया के स्वामी हैं।

यह श्लोक 4.5 के बाद आता है और अर्जुन के प्रश्न (4.4) का पूरा उत्तर यहाँ मिलता है। अजन्मा होकर भी प्रकट होना — यही भगवान और जीव में मूल अंतर है।

अगले श्लोक (4.7-4.8) में कृष्ण बताते हैं कि वे कब और किस उद्देश्य से प्रकट होते हैं — यही अवतार का प्रयोजन है।

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