कृष्ण का उत्तर यहाँ बड़ा गहरा है। वे कहते हैं — मैं अजन्मा हूँ, मेरा नाश नहीं होता, मैं समस्त प्राणियों का ईश्वर हूँ — फिर भी अपनी प्रकृति को आश्रय लेकर, अपनी माया से प्रकट होता हूँ। जैसे सूर्य आकाश में सदा है, लेकिन पानी में उसका प्रतिबिम्ब दिखता है — सूर्य उतरा नहीं, पर दिखता है।
यह श्लोक अवतार के रहस्य को समझाता है। भगवान का प्रकट होना उनकी परतंत्रता नहीं, उनकी इच्छाशक्ति है। वे माया से बंधे नहीं हैं — वे माया के स्वामी हैं।