📿 श्लोक संग्रह

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च

गीता 4.40 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥
अज्ञः
अज्ञानी
और
अश्रद्दधानः
श्रद्धाहीन
संशयात्मा
संशयी मन वाला
विनश्यति
नष्ट होता है
न अयम् लोकः
यह लोक भी नहीं
अस्ति
है
न परः
न परलोक
न सुखम्
न सुख
संशयात्मनः
संशयी के लिए

कृष्ण तीन प्रकार के व्यक्तियों का उल्लेख करते हैं जो भटकते हैं — अज्ञानी, श्रद्धाहीन और संशयी। इनमें से सबसे कठिन अवस्था संशयी की है। जो हर बात में शक करता रहे — न इधर, न उधर — वह न यहाँ सुखी है, न कहीं और। जैसे दो नावों पर पाँव रखने वाला डूबता है।

संशय बुद्धि का दोष नहीं, बल्कि कभी-कभी स्वाभाविक है — लेकिन जब संशय स्थायी हो जाए, तो प्रगति रुक जाती है।

4.39 में श्रद्धावान की प्रशंसा थी। यहाँ उसके विपरीत — अश्रद्धावान और संशयी — का वर्णन है।

अगला श्लोक (4.41) उस व्यक्ति की बात करता है जिसने योग से कर्म-त्याग किया और ज्ञान से संशय काटा।

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