📿 श्लोक संग्रह

अपरं भवतो जन्म

गीता 4.4 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥
अपरम्
बाद का, नया
भवतः
आपका
जन्म
जन्म
परम्
पहले का, पुराना
विवस्वतः
विवस्वान् का
कथम्
कैसे
एतत्
यह
विजानीयाम्
समझूँ, जानूँ
त्वम्
आपने
आदौ
आरम्भ में
प्रोक्तवान्
कहा था

अर्जुन का यह प्रश्न बहुत स्वाभाविक है। वे कहते हैं — कृष्ण, आपका जन्म अभी हुआ है, सूर्यदेव विवस्वान् तो युगों पुराने हैं। तो यह कैसे माना जाए कि आपने आरम्भ में उन्हें यह योग सिखाया? यह प्रश्न वैसा ही है जैसे कोई बच्चा पूछे — दादाजी ने आपको कैसे सिखाया जब आप तो दादाजी से छोटे हैं?

यह प्रश्न गीता में एक बड़े रहस्य का द्वार खोलता है — भगवान के जन्म और मनुष्य के जन्म में क्या अंतर है। अगले दो श्लोकों में कृष्ण इसका उत्तर देते हैं।

यह श्लोक अर्जुन का प्रश्न है, कृष्ण का उत्तर नहीं। गीता में यह दुर्लभ क्षण है जब अर्जुन कृष्ण के कथन पर सीधे जिज्ञासा रखते हैं।

इस प्रश्न का उत्तर 4.5 और 4.6 में मिलता है, जहाँ कृष्ण जन्म-जन्म के रहस्य और अपनी माया की बात करते हैं।

अध्याय 4 · 4 / 42
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