📿 श्लोक संग्रह

श्रद्धावांल्लभते ज्ञानम्

गीता 4.39 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
श्रद्धावांल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥
श्रद्धावान्
श्रद्धायुक्त
लभते
पाता है
ज्ञानम्
ज्ञान को
तत्परः
उसमें तत्पर, लगा हुआ
संयतेन्द्रियः
इन्द्रियों को वश में किए हुए
लब्ध्वा
पाकर
पराम्
परम
शान्तिम्
शांति को
अचिरेण
शीघ्र
अधिगच्छति
प्राप्त होता है

कृष्ण तीन गुण बताते हैं जो ज्ञान पाने के लिए चाहिए — श्रद्धा, तत्परता और इन्द्रिय-संयम। जो इन तीनों से युक्त है, वह ज्ञान पाता है और शीघ्र ही परम शांति को प्राप्त होता है। जैसे जो बीज को सही मिट्टी, पानी और धूप दे — फसल जल्दी आती है।

यहाँ 'अचिरेण' यानी शीघ्र — यह शब्द आशावान है। सही तैयारी हो तो ज्ञान देर नहीं लगाता।

पिछले श्लोक (4.38) में ज्ञान की सर्वोच्चता बताई। यहाँ उसे पाने की शर्तें बताई जाती हैं।

अगला श्लोक (4.40) उसके विपरीत व्यक्ति का चित्र देता है — संशयी और अश्रद्धावान।

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