📿 श्लोक संग्रह

न हि ज्ञानेन सदृशम्

गीता 4.38 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥
न हि
नहीं है
ज्ञानेन
ज्ञान के
सदृशम्
समान
पवित्रम्
पवित्र करने वाला
इह
इस संसार में
विद्यते
मिलता है
तत्
वह ज्ञान
स्वयम्
स्वयं
योगसंसिद्धः
योग में सिद्ध हुआ व्यक्ति
कालेन
समय के साथ
आत्मनि
अपने भीतर
विन्दति
पाता है

कृष्ण कहते हैं — इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ और नहीं है। और यह ज्ञान योग में सिद्ध हुआ व्यक्ति समय के साथ अपने भीतर ही खोज लेता है — किसी और के पास जाने की ज़रूरत नहीं। जैसे मिट्टी के भीतर पानी होता है, कुआँ खोदने पर मिल जाता है।

यह आशा का वचन है — ज्ञान बाहर से नहीं आता, भीतर ही छुपा है। साधना उसे प्रकट करती है।

यह श्लोक 4.37 में ज्ञान-अग्नि के वर्णन के बाद आता है। ज्ञान सबसे बड़ा शुद्धिकर्ता है और वह भीतर ही मिलता है।

अगला श्लोक (4.39) श्रद्धावान और जितेन्द्रिय की बात करता है जो ज्ञान पाता है।

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