📿 श्लोक संग्रह

अपाने जुह्वति प्राणम्

गीता 4.29 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे ।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥
अपाने
अपान वायु में
जुह्वति
अर्पित करते हैं
प्राणम्
प्राण वायु को
प्राणे
प्राण वायु में
अपानम्
अपान वायु को
तथा
इसी तरह
अपरे
कुछ और
प्राणापानगती
प्राण और अपान की गति को
रुद्ध्वा
रोककर
प्राणायामपरायणाः
प्राणायाम में तत्पर

यहाँ प्राणायाम को यज्ञ कहा गया है। प्राण और अपान — श्वास और उच्छ्वास — एक दूसरे में अर्पित किए जाते हैं। श्वास को रोककर एक ख़ास स्थिति में स्थिर किया जाता है। यह शरीर की शक्ति और मन की एकाग्रता का अभ्यास है — जैसे एक कुशल नाविक नाव की पतवार को सधे हाथ से थामता है।

प्राणायाम केवल साँस की क्रिया नहीं, यह भीतरी ऊर्जा को साधने का मार्ग है। परम्परा में इसे आत्मशुद्धि का एक मुख्य उपाय माना जाता रहा है।

यह श्लोक यज्ञ-सूची में प्राणायाम का स्थान बताता है। शरीर-साधना भी आध्यात्मिक यज्ञ हो सकती है।

अगला श्लोक (4.30) आहार-नियंत्रण के यज्ञ और यज्ञ के ज्ञाताओं की बात करता है।

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