यहाँ प्राणायाम को यज्ञ कहा गया है। प्राण और अपान — श्वास और उच्छ्वास — एक दूसरे में अर्पित किए जाते हैं। श्वास को रोककर एक ख़ास स्थिति में स्थिर किया जाता है। यह शरीर की शक्ति और मन की एकाग्रता का अभ्यास है — जैसे एक कुशल नाविक नाव की पतवार को सधे हाथ से थामता है।
प्राणायाम केवल साँस की क्रिया नहीं, यह भीतरी ऊर्जा को साधने का मार्ग है। परम्परा में इसे आत्मशुद्धि का एक मुख्य उपाय माना जाता रहा है।