📿 श्लोक संग्रह

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञाः

गीता 4.28 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥
द्रव्ययज्ञाः
धन-द्रव्य से यज्ञ करने वाले
तपोयज्ञाः
तप से यज्ञ करने वाले
योगयज्ञाः
योग-साधना रूपी यज्ञ करने वाले
तथा
इसी तरह
अपरे
कुछ और
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाः
स्वाध्याय और ज्ञान रूपी यज्ञ करने वाले
और
यतयः
यत्नशील, संयमी
संशितव्रताः
दृढ़ व्रत वाले

कृष्ण यहाँ चार प्रकार के यज्ञों का नाम लेते हैं — द्रव्ययज्ञ (धन दान करना), तपोयज्ञ (तपस्या करना), योगयज्ञ (योग-साधना), और स्वाध्याय-ज्ञानयज्ञ (शास्त्र पढ़ना और ज्ञान प्राप्त करना)। ये सभी दृढ़ व्रत वाले साधक करते हैं।

यह सूची बताती है कि साधना का एक ही रूप नहीं है। जिसके पास धन है वह दान से, जिसके पास शरीर की शक्ति है वह तप से, जिसके पास ज्ञान है वह पढ़ने-सिखाने से — सब अपने-अपने तरीके से यज्ञ कर सकते हैं।

यह 4.25 से चली यज्ञ-सूची का चौथा श्लोक है। यहाँ भौतिक, तपस्यात्मक, और ज्ञान-मार्ग — तीनों को यज्ञ कहा गया है।

अगला श्लोक (4.29) में प्राणायाम को यज्ञ के रूप में बताया गया है।

अध्याय 4 · 28 / 42
अध्याय 4 · 28 / 42 अगला →